बिहार में शराबबंदी के 10 साल: फायदे, नुकसान और जमीनी हकीकत क्या कहती है?
शराब सेवन में गिरावट और घरेलू पोषण में सुधार के संकेत, लेकिन अवैध शराब, वैकल्पिक नशे और राजस्व पर बहस अब भी जारी

रिपोर्ट: ओमकार नाथ | Rivent भारत TV
बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुए अप्रैल 2026 में दस वर्ष पूरे हो चुके हैं। वर्ष 2016 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार ने महिलाओं की लंबे समय से चली आ रही मांग के बाद राज्य में शराब की बिक्री और सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध लागू किया था। दस वर्ष बाद शराबबंदी को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या इस फैसले ने बिहार के परिवारों और समाज की तस्वीर बदली?
शराबबंदी के समर्थकों का दावा: परिवारों पर पड़ा सकारात्मक असर

शराबबंदी के समर्थन में सबसे प्रमुख तर्क महिलाओं और परिवारों की आर्थिक स्थिति से जुड़ा है। शराब पर खर्च होने वाली रकम के बचने से कई परिवारों में राशन, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और घरेलू जरूरतों पर खर्च बढ़ने की बात सामने आती रही है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) से जुड़े अध्ययनों में बिहार में पुरुषों के रिपोर्टेड शराब सेवन में उल्लेखनीय कमी के संकेत मिले हैं। कुछ शोधों में शराबबंदी के बाद ग्रामीण परिवारों के भोजन और पोषण संबंधी खर्च में भी सकारात्मक बदलाव दर्ज किए गए हैं।
महिला संगठनों और शराबबंदी समर्थकों का कहना है कि इसका सबसे बड़ा सामाजिक लाभ घरेलू हिंसा और परिवार की आर्थिक असुरक्षा में कमी के रूप में देखा गया है।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी मौजूद

शराबबंदी के बावजूद बिहार में अवैध शराब की बिक्री और तस्करी पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी है। राज्य की सीमाओं से शराब की तस्करी, अवैध बिक्री और चोरी-छिपे शराब उपलब्ध कराने के मामले लगातार चुनौती बने हुए हैं।
शराबबंदी लागू होने के बाद जहरीली शराब से होने वाली मौतों ने भी कानून के प्रभावी क्रियान्वयन और अवैध शराब के नेटवर्क पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
इसके अलावा यह बहस भी जारी है कि शराब पर प्रतिबंध के कारण कुछ लोगों में दूसरे प्रकार के नशे की ओर जाने का खतरा बढ़ा है या नहीं। इस विषय पर व्यापक और स्वतंत्र अध्ययन की जरूरत है, ताकि राजनीतिक दावों के बजाय प्रमाण आधारित निष्कर्ष सामने आ सकें।
सरकार के राजस्व का सवाल
शराबबंदी का आर्थिक पक्ष भी लंबे समय से बहस का विषय रहा है। शराब की बिक्री पर प्रतिबंध से राज्य को आबकारी राजस्व का नुकसान हुआ। हालांकि, समर्थकों का तर्क है कि शराब से मिलने वाले राजस्व की तुलना परिवारों और समाज पर पड़ने वाले स्वास्थ्य, दुर्घटना, हिंसा और आर्थिक बोझ से की जानी चाहिए।
दूसरी ओर आलोचक मानते हैं कि राजस्व की कमी और अवैध शराब के कारोबार को नियंत्रित करना शराबबंदी की बड़ी चुनौतियों में शामिल है।
क्या शराबबंदी पूरी तरह सफल रही?

दस साल के अनुभव को केवल सफल या असफल के दो खानों में रखना शायद पर्याप्त नहीं होगा। शराबबंदी से शराब सेवन में कमी और परिवारों को होने वाले कुछ सामाजिक-आर्थिक लाभ के संकेत मिलते हैं, लेकिन अवैध शराब, तस्करी, कानून के दुरुपयोग की शिकायतें और प्रवर्तन की चुनौतियां भी मौजूद हैं।
इसलिए अब आवश्यकता केवल कानून लागू करने की नहीं, बल्कि उसके सामाजिक प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन करने की है।
आगे की राह क्या हो?
शराबबंदी को प्रभावी बनाने के लिए तीन स्तरों पर काम जरूरी दिखाई देता है—
पहला—रोजगार और कौशल विकास: युवाओं को रोजगार, खेल और कौशल विकास से जोड़ना।
दूसरा—नशामुक्ति और पुनर्वास: शराब या अन्य नशे की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए पर्याप्त काउंसलिंग और पुनर्वास सुविधाएं उपलब्ध कराना।
तीसरा—स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट: दस वर्षों में शिक्षा, स्वास्थ्य, घरेलू हिंसा, पारिवारिक आय, अपराध और सरकारी राजस्व पर शराबबंदी के वास्तविक प्रभाव का स्वतंत्र अध्ययन कराया जाना।
निष्कर्ष: असली लक्ष्य स्वस्थ और सुरक्षित परिवार
बिहार की शराबबंदी दस वर्षों में एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक प्रयोग बन चुकी है। इसके समर्थकों के पास परिवारों और महिलाओं को हुए लाभ के तर्क हैं, जबकि आलोचक इसके क्रियान्वयन, अवैध शराब और राजस्व नुकसान को लेकर सवाल उठाते हैं।
इसलिए आगे की नीति आंकड़ों और जमीनी अनुभवों के आधार पर तय होनी चाहिए। शराब की दुकानें बंद होना अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं है। अंतिम लक्ष्य ऐसा बिहार होना चाहिए, जहां परिवार आर्थिक रूप से मजबूत हों, महिलाएं सुरक्षित हों, बच्चे शिक्षा से जुड़े हों और युवाओं के पास रोजगार तथा बेहतर भविष्य के अवसर हों।
रिपोर्ट: ओमकार नाथ
Rivent भारत TV










