लोकसभा में बहुचर्चित महिला आरक्षण विधेयक के पारित नहीं होने पर बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इसे “काला दिन” करार देते हुए विपक्षी दलों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि यह घटना न केवल आरक्षण का अपमान है, बल्कि देश की महिलाओं के साथ सीधा धोखा भी है।

रविवार को पटना स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कांग्रेस, राजद सहित अन्य विपक्षी दलों की मंशा पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष नहीं चाहता कि गरीब परिवारों की महिलाएं संसद तक पहुंचें।
मुख्यमंत्री ने कहा कि विपक्ष की सोच यह है कि “उनके घर की महिलाएं सांसद बनें, लेकिन गरीबों की बेटियां नहीं।” उन्होंने राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी का नाम लेते हुए कहा कि इनके परिवार के सदस्य राजनीति में आगे बढ़ते हैं, लेकिन आम महिलाओं के लिए अवसर रोक दिए जाते हैं।
उन्होंने बताया कि यदि यह विधेयक पास हो जाता, तो बिहार विधानसभा में महिला जनप्रतिनिधियों की संख्या 29 से बढ़कर 122 तक पहुंच सकती थी। वहीं संसद में कुल सीटें बढ़कर 816 हो जातीं, जिनमें 216 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होतीं।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि देश की बढ़ती आबादी के बावजूद संसद की सीटों में वृद्धि नहीं हुई है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस प्रस्ताव का उल्लेख किया, जिसमें सांसदों की संख्या 850 तक बढ़ाने की बात कही गई थी।
महिलाओं के सशक्तिकरण पर एनडीए का जोर
मुख्यमंत्री ने कहा कि एनडीए सरकार ने हमेशा महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। उन्होंने बताया कि 2006 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में पंचायत और नगर निकायों में 50% महिला आरक्षण लागू किया गया, जिसके परिणामस्वरूप आज राज्य में 59% से अधिक महिला जनप्रतिनिधि हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि एनडीए महिलाओं के अधिकारों के लिए देशभर में अभियान चलाएगी और विपक्ष से जवाब मांगेगी कि गरीब महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व कब मिलेगा।
प्रेस वार्ता में कई महिला नेता रहीं मौजूद
इस प्रेस वार्ता में राज्यसभा सांसद दर्शना सिंह, पूर्व मंत्री लेसी सिंह, विधायक स्नेहलता कुशवाहा, ज्योति देवी, एमएलसी अनामिका सिंह पटेल सहित कई महिला जनप्रतिनिधि मौजूद रहीं। सभी ने एक स्वर में विपक्षी दलों की आलोचना करते हुए महिला आरक्षण के समर्थन में अपनी बात रखी।
निष्कर्ष:
महिला आरक्षण बिल को लेकर सियासत तेज हो गई है। जहां सत्तापक्ष इसे महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा बता रहा है, वहीं विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। आने वाले समय में यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बना रह सकता है।









